कहानिया हौसोलो की
हौसला.
साहित्य, कला और फिल्मी दुनिया से जुड़ा एक साहित्यिक मंच
अक्तूबर 24 | 20
कहानिया हौसोलो की
(एक)
उसने कहा था
एक बार
उसने कहा था
क्या आपने कभी
मुरझाते हुए फूल को देखा है
कुछ देर चुपचाप मैं उसे देखता रहा
फिर मुस्कुराते हुए बोला
प्रेम में देखी गई कोई चीज
मुरझाती कहां है
बल्कि और भी ज्यादा खूबसूरत हो जाती है
वह मुस्कुराई और पलट कर चली गई
तब से देख रहा हूं मैं उसे
पहले से और भी ज्यादा खूबसूरत है।।
(दो)
कभी-कभी
हर रोज की तरह
आज भी लगभग मध्यरात्रि हो चुकी है
एक निर्जीव की भांति
बैठा हूं मैं अपनी चारपाई पर
पैर लटकाए
सामने की आलमारी पर
कुछ बिखरी हुई किताबें हैं
जिनमें मैं अभी-अभी
उलझा हुआ था
घर के सभी सदस्य
लगभग नींद में होंगे
लेकिन मां,
अभी भी जाग रही है
वह बोलती कुछ नहीं है
बस देखती है बहुत ध्यान से
मेरी तरफ
और मैं,
बैठे बैठे ढूंढ रहा होता हूं
घर की उन तमाम समस्याओं का हल
जिन्हें मां और पिता जी
एक साथ बैठकर ढूंढा करते हैं
कभी-कभी!
(तीन)
एक बीस वर्षीय लड़का
वह उम्र के उस मोड़ पर
आ खड़ा है
जहां पर अनगिनत रास्ते हैं
वह पूरी तरह से भ्रमित है
उन पर चलने के लिए
उसके कदम डगमगा रहें हैं
उसका साथ नहीं दे रहे हैं।
वह एक घायल परिंदे की भांति
फड़फड़ा रहा है
उसे डर है
भविष्य की उन तमाम योजनाओं से
जिसे आये दिन तैयार करता है
उसके पास धीरज है, धैर्य है
लेकिन कहीं न कहीं व्याकुलता है
कुछ पाने की...
वह सपने देखता है
खुली हुई आंखों से
और उदास हो जाता है
वह जानता है कि
दुनियां कितनी बदल चुकी है
विगत कुछ वर्षों में ही
वह समझदार भी है और बहुत नासमझ भी
वह कविताएं लिखता है प्रेम पर
क्योंकि उसे मालूम है कि
प्रेम में रहकर ही अपनी भीतरी
और बाहरी दुनियां के
उजाड़ से बचा जा सकता है।।
(चार)
वो चाहती है
वो चाहती है कि
उसे अत्यधिक प्रेम करे कोई
ऐसे ही मीठे-मीठे सपनों में रहती खोई
किन्तु सपनों को वो बयां नहीं कर पाती
खामोशी उसे भीतर से बहुत सताती
वो चाहती है कि
मुझसे चैटिंग करे वह
लेकिन वो खुद डर रही है कि कहीं वह...
एहसासों को वो बता नहीं सकती है
केवल नजरों से इशारा करती है।।
(पांच)
उसने कहा
उसने कहा-
तुम कविताएं क्यों लिखते हो
मैंने कहा-
बस यूं ही
उसने कहा-
तुम आजकल बोलते बहुत कम हो
मैंने कहा-
लोग सुनना ही कहां चाहते हैं
उसने कहा-
मुझे तुम्हारे साथ कुछ वक्त बीताना है
मैंने कहा-
समय का अभाव है
इस बार
उसने कुछ नहीं बोला...
आखिर में,
जाते हुए मैंने सिर्फ इतना कहा
मैंने खुद को लिखा है अपने फेसबुक पटल पर
संभव हो तो देख लेना
मैं यकीन के साथ कह रहा हूं कि
जब कभी भी तुम, मुझे पढ़ते हुए
खुद से मिलोगे तो, मुस्कुराओगे जरुर।।
(छ:)
एक दिन
एक दिन
मैंने उससे कहा
अपने हजार बार
न कह पाने का दुःख
लेकिन वह
हर बार की तरह
चुप शान्त अडोल
आसमान की ओर
निहार रही थी
एक बार फिर मैं
उसकी आंखों में
अपनी आंखों से
उदासियों का आसमान
देख आया।।
(सात)
एक पागल
एक पागल लड़का
घंटों बैठा रहता है अपने कमरे में
उसका मन चारों दिशाओं में भटकता है
दीवारों से बतियाता है
किताबों के पन्ने पलटता है
कुछ नग्में गुनगुनाता है
बीते लम्हों को बुलाता है
कभी सुकून ढूंढता है
कभी बेचैन हो उठता है
धुकधुकी है छाती के भीतर
कुछ कह नहीं पाता
जाने अनजाने में उसे डर सा है
लाइफ के आगे डगर की
कुछ छोटे मोटे सपने बुनता है
खामोशियों को छुपाता है
फिर चेहरे पर मुस्कान लेकर
निकल पड़ता है अपने कमरे से
मतलबी दुनियां में।।
(आठ)
जानता हूं मैं
जानता हूं मैं
कि लगभग दृश्य अब
अदृश्य हो रहा है
न ईमानदारी में ईमानदारी है
न सच्चाई में अच्छाई है
न तसल्ली में तसल्ली है
न दुःख में दुःख
चालाकियां भी अब सारे आम नग्न हैं
बेईमानियां खुलेआम घूम रहीं हैं, पेट फुलाए
और चोर चौराहे पर कर रहा है घोषणा
कि वह चोर है
हत्यारे को अब
छिपने की जरूरत ही नहीं
यकीनन आपको भी
महसूस हो रहा होगा।।
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